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Recent Episodes
प्रेम बनाम प्रजनन
प्रेम अनजाना रहस्य है और प्रजनन पसरा हुआ विस्तार है।
साँप और नेवला - सभ्यताओं का युद्ध (From archives)
Two nation theory in parallel universe!
सूरज का चालीसवां फेरा
समय अच्छा, बुरा, धीमा, तेज़, लम्बा छोटा सब होता है। समय जितने रूप धर सकता है कोई और धर सकता है क्या?
ग्रीटिंग कार्ड और सच्ची का नया साल
जब पेन की स्याही और ग्रीटिंग कार्ड के सख़्त कागज़ मिलकर नया साल मुबारक कर देते थे।
इश्क़ का साढ़े सातवां मक़ाम
इश्क़ का साढ़े सातवां मक़ाम - जी भर कर जी हुई ज़िंदगी
उत्तर प्रदेश - अधोपतन से उर्ध्वगमन तक
उत्तर प्रदेश - दुनिया को प्रतिभा का कच्चा माल देकर खुद अपने हँसते खेलते आँगन को कंगाल कर दे रहा था। उसी पर एक टिप्पणी।
ज़ेहरा और मानव - टीस का पूर्णविराम
पूर्ण विराम और हज़ारों खाली पन्ने
S1E9 ज़ेहरा और मानव - महकी मुलाकातें
बात या साथ, दोनों में क्या खास जब ये समझ आना बंद हो जाए तो आप की मुलाकातें महक उठती हैं।
S1E8 ज़ेहरा और मानव - सिलसिला
बातें बेल की तरह हैं, जहां सहारा मिला वहीं बढ़ जाती हैं, और फैलने लगती हैं छाने लगती हैं। और अगर बातों में दम हो तो बातों से उपजी यादें एक दिन बरगद बन जाती हैं, जितनी पुरानी उतनी ही शाखाएँ और उनसे…
S1E7 ज़ेहरा और मानव - रात के दो-ढाई बजे
बातें ही बात बढ़ाती हैं, बशर्ते लोग बातें कर रहे हों, बस बोल न रहे हों।
S1E6 ज़ेहरा और मानव - गुंडे और गाने
नायक गुंडों की पिटाई भी कर सकता है और गाने भी गा सकता। हिंदी सनीमी ने तो यही दिखाया है खैर!
S1E5 ज़ेहरा और मानव - ५ बनाम ३६५
तुम्हारे साथ बिताया समय ही मेरी दौलत है, उसे दिमाग़ में घुमा लेता हूं तो जो ROI मिलता है, वो कोई multibagger नहीं दे पाएगा।
S1E4 ज़ेहरा और मानव - Love in the air
जब हम किसी के बगल होने भर से खिल जाएं, तो समझिए कि आप दोनों बीच के अनूठा अनुनाद है।
S1E3 ज़ेहरा और मानव - उन्नीस से उन्यासी तक
जो हवा में है, वो हमेशा मामूली नहीं होता और जो ठोस है वो हमेशा खास नहीं होता।
S1E2 ज़ेहरा और मानव - सांसे, बातें और पहाड़
आज बिना कुछ चाहे वो ज़ेहरा को अपनी आँखों मे देखने दे रहा था, इस उम्मीद में कि ज़ेहरा उसके मन के उस कोने में उतर जाए जहाँ कभी कोई नहीं गया, किसी ने वो जगह बुहार के वहाँ थोड़ा पानी छिड़क कर दीपक नहीं जलाया
S1E1 ज़ेहरा और मानव - भँवरे की गुनगुन
उस पहाड़ पर जाकर हम लौट तो आए , और जितना खुद को लेकर गए थे उससे कहीं ज्यादा ही होकर आए, फिर लगता है वहां बहुत कुछ छोड़ आए!
S1E1 दोपहर और दो साँसें
बेतरतीब से कमरे के बीच में एक पलंग जिसपर हम दोनों पसरे थे, पर्दे लगे थे और रोशनी छन कर आ रही थी, मैं उसे देख रहा था, उसकी आंखों के नीचे के हल्के स्याह निशान, उसका वो सफेद सा चेहरा, वो मेरी दाढ़ी और…
S1E1 फूलों की सड़क
लाल-केसरिया-सफ़ेद रंग से पटे उस सड़क के दोनों किनारे ... और उसके बीच से कहीं बहुत दूर जाती वो सड़क। उस खुश्बू में, सब कुछ नरम सा था, हमारे साथ की तरह
S1E1 जो दूर है वो नूर है।
तारों तक पहुंचने में भी आपका ज्यादातर समय तो अंतरिक्ष में ही बीतता है, ठीक वैसे ही सच ढूंढने वाले का जीवन भी झूठ को पार करने में ही बीतता है।
S1E1 खाली रातें
रातों के ढेर में तुम्हारी यादें, भूँसे के ढेर में चमकती सुई।
Frequently Asked Questions
Voice Of Sanket has published 27 episodes since April 2020, covering topics in Relationships, Society & Culture.
Voice Of Sanket is currently active with new episodes monthly. Average episode length is 10m.
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